Sunday, 12 May 2019

Silent Voices

वो बहुत सारा जो वक़्त था ना जाने अब कहाँ है
तुम्हारी ज़ेब में पड़े नोट कहीं उसकी कीमत तो नहीं
वो हर शाम जिस कॉल का तुम्हे इंतज़ार होता था
कहीं वो आवाज अब मुसीबत तो नहीं


  आशिक़ी तो उसकी ऐसी थी की पूरा ज़माना रस्ते से हट गया
        बड़ी देर से पता चला उसे की उसका भी कट  गया

सपने बहुत देख रखें हैं दौड़ना पड़ेगा उस ओर अब
कदम आगे क्या बढ़ाया ज़िन्दगी बीच में आ गयी
   
 समझाया रिश्तेदारों ने की कुछ करो, कामयाब बनो
      और हमे लगा था  की ज़िन्दगी सिर्फ जीने के लिए होती है

जो गिर कर उठने के लिए सहारे की उम्मीद तुम्हे भी है
    तो या तो उम्मीद छोड़ दो या उठने का ख्याल

                                 
      इस सब से इतर कहीं कोई ख्वाब तुम्हारा भी होगा ज़रूर     
   पर हक़ीक़त में जीना बड़ी कोशिशों से सीखा है हमने





                           




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