Monday, 17 February 2020

सच्चे अल्फ़ाज़

          कुछ भ्रम मेरे भी टूटे हैं, कि रिश्ते ये कितने झूठे हैं
           चेहरों से ज्यादा मुखौटे हैं, सिक्के ये सारे खोटे हैं

        बड़ी घुटन है इन दीवारों में, बड़ा शोर है बेगानेपन का
       बड़ी खुदगर्ज़ी है हवाओं में, एक ज़र्रा नहीं अपनेपन का

     इमारतें हज़ार खड़ी हैं लेकिन एक घर का पता मालूम नहीं
   दीवार तो है और दरवाज़े भी पर एक पल का यहाँ सुकून नहीं

 मेरा इतना इम्तेहान न ले ऐ ज़िन्दगी, मै अकेला हूँ कोई हुज़ूम नहीं
 ये उधार की छत और ये कोसती दीवारें, मेरे हालात हैं तक़दीर नहीं

जो कल पनाह देने के वादे कर रहे थे वो आज बेघर करने के इरादे से आये हैं
 मुझे इंद्रधनुष का पता नहीं पर लोगो ने बड़े रंग बदल-बदल कर दिखाए हैं

               बहुत थक गया हूँ मैं, मुझे कुछ आराम दे दो
                  थोड़ा ठहराव दे दो या पूर्ण विराम दे दो
               सब टूट टूट बिखरा है, कुछ नए अरमान दे दो
                   थोड़ा ठहराव दे दो या पूर्ण विराम दे दो
               बड़ी उलझनों में हूँ, कोई तुम समाधान दे दो
                  थोड़ा ठहराव दे दो या पूर्ण विराम दे दो

          जीने देना बड़ा मुश्किल है तो मौत ही आसान दे दो
             बहुत थक गया हूँ मैं, मुझे कुछ आराम दे दो
                थोड़ा ठहराव दे दो या पूर्ण विराम दे दो
                                                                       Aditya Vikram Singh
                                                                        एक कविता बिहार से